खबर के साथ और दर्द की आवाज़ -विचारों का प्याला

ek din phale....jai ganesh ji ki .....jai ganpati baba ki .............
par baad me kya.....
aap ne to bhagwan ko sira diya.....
par baad me ganesh ji ka kya hota hai...
abhi pata kiya hai....
abhi sacha hai...
abhi dekaha hai....
ek sach jo aap jante hai par mante nahi hai....
kya yahi hai aap ki bhagati....
kya yahi hai aap ka pyar ...
खबर के साथ और दर्द की आवाज़ -विचारों का प्याला
ek sach jo aap bhi jante hai par.................mante hai...
ganesh baba ki.....jai ganpati baba ki .....jai hoo....
ek din to aap bhagwan ki pooja karte hai .....
unki morti ki pooja kar ke....jal me oonhe sirate hai.....
or fir ghar par aa jate hai....
kya aap ko pata hai ...
ki aap ke dduvra bhagwan ki morti ka kya hoti hai....
jara ek baar to aapne bhagwan ko yaad kar ke os jagah ja kar dekha to lo ki .....
aap ke bhagwan kis halatt me hai....
खबर के साथ और दर्द की आवाज़ -विचारों का प्याला
मैंने ‘सच का सामना’ के कुछ अंश देखे हैं। मुझे इसे देखकर बचकाने सवाल पूछने वाले पर गुस्सा आया, इस कार्यक्रम में भागीदार बनने वालों पर गुस्सा आया जो कुछ पैसों के लिए ऐसे सवालों के जवाब दे रहे थे जिनसे उनके प्रियजनों को आघात लग सकता है, इस कार्यक्रम के दिमागहीन निर्माताओं पर भी गुस्सा आया और उस समाज पर भी जो उसके सामने परासे जाने वाले किसी भी कार्यक्रम को देखने के लिए तैयार रहता है।
सबसे पहले तो इस कार्यक्रम का सत्य से कोई लेना-देना नहीं है, जैसा कि माना जा रहा है। ‘सच का सामना’ की बजाय इसे ‘अनुभव का सामना’ कहा जाना अधिक उचित रहेगा। या सीधे-सीधे कहा जा सकता है कि ‘अपना दर्द मुझे दिखाओ’। यह ऐसा खेल है जिसमें दर्शकों और भागीदार के बीच फंसे परिजन और दोस्त अपने संसार को राष्ट्रीय टेलीविजन पर ध्वस्त होते देखते हैं। निश्चित तौर पर इसमें जो भी व्यक्ति भाग लेता है, उससे कई सवाल पॉलीग्राफ मशीन के सामने पूछे जाते हैं।
इनमें से वे ही कुछ सवाल शो मंे फिर से दोहराए जाते हैं। इसलिए कैमरे के सामने भागीदार जो भी कहता है, वह महत्वहीन है। उसकी किस्मत तो पहले ही सील हो चुकी है। यह कार्यक्रम निरंतरता का परीक्षण है। यदि भागीदार ने पहले हां कहा हो और अब ना, तो उसे झूठा करार दिया जाएगा, भले ही सच कुछ भी हो। सत्य का बाहरी सच्चई से कोई लेना-देना नहीं है।
पॉलीग्राफ मशीन ऐसी अविश्वसनीय मशीन है जो अक्सर सच्चाई का पता लगाने में विफल रहती है। इसमें नर्वस अनुभव करने वाले लोग फंस जाते हैं, जबकि झूठ बोलने में उस्ताद आसानी से पार पा लेते हैं। यदि आप बगैर तनाव में आए झूठ बोल सकते हैं तो पॉलीग्राफ मशीन आपको कभी भी नहीं पकड़ सकती।
इसलिए यदि कोई एक करोड़ रुपए का जैकपॉट जीतता है तो हो सकता है वह झूठ बोलने मंे माहिर हो! इसके अलावा सच को केवल हां या नहीं जैसे जवाब तक सीमित कर देना भी अपने आप में काफी दुखद है। उदाहरण के लिए ‘क्या आप अच्छे पिता हैं?’ जैसे सवालों में आप जरा सा हिचके नहीं कि झूठे ठहरा दिए जाएंगे।
यह वह दुनिया है जिसमें हम ईमानदारी का मजाक उड़ाते हैं और कल्पनाजगत की सचाइयों को नहीं बता सकते। ‘क्या तुम्हारे मन में ऐसी महिला के प्रति कामुक विचार आया जो तुम्हारी पत्नी नहीं है?’ हम यह भूल जाते हैं कि व्यक्ति को उसके कार्यो से तौला जाता है, उसके मन में आए विचारों से नहीं।
अमेरिका के शो ‘मोमेंट ऑफ ट्रूथ’ की प्रतिकृति इस शो के निर्माता सच नहीं, बल्कि सी-ग्रेड की सामग्री उपलब्ध करवा रहे हैं। यदि आपको सच को स्वीकारना ही है तो पादरी या पुजारी के पास जाइए। अपने परिवार से बात कीजिए। डायरी लिखिए। जनता के सामने अपनी निजी जिंदगी के बारे मंे घटिया सवालों के जवाब देना बहादुरी नहीं है।
खबर के साथ और दर्द की आवाज़ -विचारों का प्याला
बाँध दे राखी मेरी कलाई, रीत ये कहती है
बहना मुझको इस दिन की प्रतीक्षा रहती है
रंग न छूटे इस माथे से ऐसा तिलक लगादे
इस कुमकुम में तेरे स्नेह की नदिया बहती है
आज सजादे मेरी कलाई, मुंह में दाल मिठाई
रोज़ नहीं आता है ये दिन, दुनिया कहती है
रक्षा-बन्धन दिन है तेरा, जो चाहे सो बोल !
तेरा ही है सब - कुछ तू संकोच क्यों करती है
फ़र्ज़ निभाउंगा 'अलबेला' रक्षा का आजीवन
करता भइया आज वही जो बहना कहती है