खबर के साथ और दर्द की आवाज़ -विचारों का प्याला
चीन के साथ भारत का तनाव चाहे जितना भी बढ़ गया हो लेकिन पिछले कई सालों में मनाए गए भारत के ज्यादातर त्योहारों की तरह इस दीवाली में भी चीन के बने सामानों का ही बोलबाला नजर आ रहा है। होली पर चीनी पिचकारियां और चीनी रंग, दशहरे पर चीनी मुखौटे और पटाखे, दीवाली पर चीन से इंपोर्ट होकर आए गणेश-लक्ष्मी, बिजली की लडि़यां और आतिशबाजी। आखिर हमारे देश को हो क्या गया है? कहीं चीन ने बिना एक भी गोली चलाए बाजारों के रास्ते इस पर धावा तो नहीं बोल दिया है? भारत सरकार का रवैया शुरू से ही इस बारे में ढीलापोली का रहा है। व्यापारियों से पूछिए तो वे इसकी बहुत सारी वजहें गिना देते हैं। लेकिन आम आदमी के लिए तो इसका सिर्फ एक तर्क है। चीन के बने सामान टिकाऊ भले न हों लेकिन सस्ते होते हैं, और जो चीजें सिर्फ एक दिन इस्तेमाल करके फेंक दी जानी हैं, उनके लिए देसी ब्रैंडों पर जरूरत से ज्यादा पैसे क्यों भरे जाएं। कुछ लोगों का यह भी कहना है कि जिन्हें देसी चीजें कह कर महंगे दाम पर हमखरीदते हैं, वे भी तो ज्यादातर चीन से ही इंपोर्ट की हुई होती हैं, सिर्फ उनके ऊपर लेबल हिंदुस्तानी चिपका दिए जाते हैं। सारे तर्क-वितर्क के ऊपर एक बात तो बिल्कुल साफ है कि भारतीय कारोबारी खुद को कम मार्जिन पर बड़ा कारोबार करने की मानसिकता में नहीं ला पा रहे हैं। पटाखे जैसी चीजों पर पांच गुना मुनाफा कमाने का लालच छोड़ा नहीं गया तो चीनी सामानों का मुकाबला नहीं किया जा सकेगा।